हिंदी भाषा और साहित्य हमारी सांस्कृतिक अस्मिता के साथ-साथ बदलते समय की चुनौतियों का सामना करने का सशक्त माध्यम : प्रो. सुनील कुमार
अमृतसर, 10 सितंबर 2026। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग द्वारा कृषि अनुसंधान और नवाचार केंद्र, रूसा 2.0 के सहयोग से ‘हिंदी पखवाड़ा’ के अंतर्गत ‘हिंदी भाषा और साहित्य : परंपरा, परिवर्तन एवं समकालीन चुनौतियाँ’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
हिंदी विभागाध्यक्ष और संगोष्ठी संयोजक प्रो. सुनील कुमार ने संगोष्ठी के विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय समाज की विविध सांस्कृतिक परंपराओं, लोक-स्मृतियों और सामाजिक चेतना को अभिव्यक्त करने वाली जीवंत भाषा है। उन्होंने कहा कि हिंदी की परंपरा को समझने के साथ-साथ उसके निरंतर हो रहे परिवर्तनों और वर्तमान समय की चुनौतियों पर गंभीर विमर्श आवश्यक है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन को नई तकनीक, डिजिटल माध्यमों और बदलती सामाजिक आवश्यकताओं से जोड़ना समय की मांग है। प्रो. सुनील कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय के यशस्वी उप-कुलपति प्रो. करमजीत सिंह के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से हिंदी विभाग द्वारा निरंतर साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने संगोष्ठी के सफलतापूर्वक आयोजन में विशिष्ट सहयोग के लिए डीन, अकादमिक मामले प्रो. हरविंदर सिंह सैनी और कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के समन्वयक प्रो. प्रताप कुमार का आभार व्यक्त किया।
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के शिक्षा विभाग के अधिष्ठाता और मुख्य अतिथि प्रो. अमित कोट्स ने अपने संबोधन में हिंदी भाषा की व्यापकता, उपयोगिता और भविष्य की संभावनाओं पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा की जीवंतता इस बात पर निर्भर करती है कि वह समय के साथ स्वयं को कितना विकसित करती है। हिंदी ने अपनी परंपरागत जड़ों को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, मीडिया और डिजिटल संचार के क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उन्होंने विद्यार्थियों से हिंदी को केवल विषय के रूप में न पढ़कर उसे ज्ञान, रोजगार, शोध और सृजन की भाषा के रूप में अपनाने का आह्वान किया।
प्रो. कोट्स ने इस बात पर बल दिया कि नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने के लिए शिक्षण पद्धतियों में रचनात्मकता और तकनीकी संसाधनों का समुचित प्रयोग होना चाहिए। उन्होंने हिंदी के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को अवसरों में बदलने तथा भाषा को वैश्विक संदर्भों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
लायलपुर खालसा महिला महाविद्यालय, जालंधर की प्राचार्या डॉ. सरबजीत कौर राय ने हिंदी भाषा और साहित्य की परंपरा के विविध आयामों पर चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी का विकास किसी एक काल या साहित्यिक धारा तक सीमित नहीं है। भक्ति आंदोलन से लेकर आधुनिक और समकालीन साहित्य तक हिंदी ने समाज के विविध वर्गों की आवाज को अभिव्यक्ति प्रदान की है।
उन्होंने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है। आज के दौर में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी विमर्श, पर्यावरण, अस्मिता और सामाजिक न्याय जैसे विषय हिंदी साहित्य को अधिक व्यापक और लोकतांत्रिक बना रहे हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को साहित्य के अध्ययन के माध्यम से संवेदनशील और विवेकशील नागरिक बनने का संदेश दिया।
श्रीमती प्रवीन शर्मा, सहायक निदेशक (राजभाषा), कार्यालय आयकर आयुक्त एवं सदस्य सचिव (नराकास), अमृतसर ने हिंदी के राजभाषा संबंधी पक्ष पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि हिंदी को राजभाषा के रूप में प्रभावी बनाने के लिए केवल औपचारिक आयोजन पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि कार्यालयीन कार्यों और दैनिक व्यवहार में इसके सहज एवं प्रभावी प्रयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है।
उन्होंने हिंदी के सरल, सुबोध और व्यवहारिक स्वरूप पर बल देते हुए कहा कि अत्यधिक कठिन शब्दावली के स्थान पर ऐसी भाषा का प्रयोग होना चाहिए जिसे सामान्य व्यक्ति आसानी से समझ सके। उन्होंने राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और विद्यार्थियों को हिंदी में काम करने तथा अपने विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया।
डॉ. मधुलिका बेन पटेल, सह-आचार्य एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा ने हिंदी साहित्य में आए परिवर्तनों और समकालीन विमर्शों पर विचार रखते हुए कहा कि साहित्य अपने समय की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से गहरे रूप में जुड़ा होता है। वर्तमान साहित्य में हाशिए के समाज, स्त्री, श्रमिक, ग्रामीण जीवन, विस्थापन, पर्यावरण और पहचान से जुड़े प्रश्न प्रमुखता से सामने आए हैं।
उन्होंने कहा कि समकालीन हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बहुलता और विविधता है। आज साहित्य के सृजन और पाठ के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। डिजिटल माध्यमों ने लेखक और पाठक के बीच की दूरी को कम किया है तथा नई साहित्यिक विधाओं और अभिव्यक्ति के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। उन्होंने शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे पारंपरिक साहित्यिक अध्ययन के साथ नए माध्यमों और समकालीन विमर्शों को भी अपने शोध का हिस्सा बनाएं।
लायलपुर खालसा महिला महाविद्यालय, जालंधर के हिंदी विभाग की सह-आचार्य डॉ. अमरदीप दयोल ने कहा कि हिंदी भाषा और साहित्य की समृद्ध परंपरा निरंतर परिवर्तनशील रही है। समकालीन समय में तकनीकी विकास और वैश्वीकरण के बीच हिंदी के सामने नई चुनौतियाँ हैं। इन चुनौतियों का सामना करते हुए हिंदी को ज्ञान, शोध और सृजन की भाषा के रूप में विकसित करना आवश्यक है।
डी.ए.वी. महाविद्यालय, अबोहर के हिंदी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अनुपाल ने हिंदी भाषा और साहित्य के बदलते स्वरूप पर चर्चा करते हुए कहा कि आज हिंदी अध्ययन को व्यापक सामाजिक संदर्भों के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। साहित्य को इतिहास, समाजशास्त्र, संस्कृति, मीडिया और संचार जैसे विषयों के साथ जोड़कर देखने से उसके नए अर्थ और संभावनाएँ सामने आती हैं।
उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में पाठक की रुचि और साहित्य के पाठ के तरीके में परिवर्तन आया है। सोशल मीडिया, ब्लॉग, ई-पुस्तकें और अन्य डिजिटल मंच हिंदी के प्रसार के नए माध्यम बन रहे हैं। उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे तकनीक को चुनौती के रूप में देखने के बजाय हिंदी के विस्तार और ज्ञान-सृजन के अवसर के रूप में अपनाएं।
ए.एस. महिला महाविद्यालय, खन्ना के हिंदी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. चमकौर सिंह ने समकालीन साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता पर विचार रखते हुए कहा कि आज का हिंदी साहित्य समाज में हो रहे तीव्र परिवर्तनों को संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त कर रहा है। उन्होंने साहित्य में आम आदमी के संघर्ष, सामाजिक असमानता, बदलते पारिवारिक संबंधों और मानवीय मूल्यों के संकट जैसे विषयों की चर्चा की।
उन्होंने कहा कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में प्रश्नाकुलता, संवेदना और वैचारिक चेतना पैदा करना भी है। उन्होंने विद्यार्थियों से वर्तमान समाज को साहित्य की दृष्टि से समझने तथा अपने आसपास घटित हो रही घटनाओं के प्रति संवेदनशील रहने का आह्वान किया।
हंसराज महिला महाविद्यालय, जालंधर के हिंदी विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. पवन कुमारी ने हिंदी भाषा के शिक्षण और युवा पीढ़ी के साथ उसके संबंध पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भाषा तभी समृद्ध होती है जब नई पीढ़ी उसे अपने जीवन, अध्ययन और अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम बनाती है।
उन्होंने हिंदी शिक्षण को अधिक संवादपरक, रचनात्मक और तकनीक-सम्मत बनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आज के विद्यार्थियों की भाषिक रुचियों और डिजिटल व्यवहार को ध्यान में रखते हुए हिंदी के अध्ययन-अध्यापन में नए प्रयोग किए जाने चाहिए। हिंदी के सामने अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं के प्रभाव को चुनौती के रूप में देखने के बजाय बहुभाषिकता के सकारात्मक पक्ष को समझने की आवश्यकता है।
संगोष्ठी के प्रथम सत्र का मंच संचालन हिंदी विभाग के शोधार्थी श्री मुकेश कुमार ने किया, जबकि एम.ए. तृतीय समस्तर के विद्यार्थी श्री कुलविंदर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। द्वितीय सत्र का संचालन हिंदी विभाग की शोध छात्रा सुश्री लवली ने किया तथा शोध छात्रा सुश्री पूजा देवी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी में हिंदी विभाग के सभी अध्यापकों, यूबीएस के प्रोफ़ेसर विक्रम संधू एवं शोधार्थियों और विद्यार्थियों के अतिरिक्त विश्वविद्यालय के शारीरिक शिक्षा विभाग, यूनिवर्सिटी बिजनेस स्कूल तथा स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक सहभागिता की। विभिन्न विषयों से आए विद्यार्थियों की उपस्थिति ने संगोष्ठी को अंतर्विषयक स्वरूप प्रदान किया और यह स्पष्ट किया कि हिंदी भाषा एवं साहित्य का सरोकार केवल हिंदी के विद्यार्थियों तक सीमित न होकर ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।
कार्यक्रम के दौरान हिंदी की परंपरा, उसके बदलते स्वरूप, राजभाषा के प्रयोग, समकालीन साहित्यिक विमर्श, डिजिटल युग की चुनौतियों, नई पीढ़ी के साथ हिंदी के संबंध तथा हिंदी के वैश्विक विस्तार जैसे विषयों पर व्यापक एवं सार्थक चर्चा हुई।
संगोष्ठी के अंत में यह निष्कर्ष उभरकर सामने आया कि हिंदी की शक्ति उसकी समृद्ध परंपरा के साथ-साथ समयानुकूल परिवर्तनशीलता में निहित है। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी को नई तकनीक, नए ज्ञान-विषयों, युवा पीढ़ी और वैश्विक संदर्भों से जोड़ते हुए उसे ज्ञान एवं सृजन की अधिक प्रभावशाली भाषा बनाया जाए।

City Air News 

