परीक्षा सिर्फ याददाश्त नहीं, योग्यता परखे : एमडीयू में शिक्षाविदों का मंथन

जन-परीक्षा-संवाद 2026 में 150 से अधिक शिक्षाविद जुटे; परीक्षा सुरक्षा, एआई, समावेशिता और विद्यार्थी कल्याण पर बनी सहमति

परीक्षा सिर्फ याददाश्त नहीं, योग्यता परखे : एमडीयू में शिक्षाविदों का मंथन

रोहतक, गिरीश सैनी। एमडीयू में भारतीय शिक्षा मंडल, हरियाणा और शिक्षक विकास केंद्र, एमडीयू के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को जन-परीक्षा-संवाद 2026 का आयोजन किया गया। संवाद में प्रदेशभर से 150 से अधिक शिक्षाविदों, परीक्षा अधिकारियों, शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक तकनीक और विद्यार्थी-केंद्रित दृष्टिकोण के अनुरूप परीक्षा एवं मूल्यांकन व्यवस्था को बेहतर बनाने पर व्यापक मंथन हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता एमडीयू के कुलपति प्रो. मिलाप पूनियाँ ने की। केंद्रीय विवि हरियाणा के कुलपति प्रो. टंकेश्वर कुमार मुख्य वक्ता रहे, जबकि सीबीएलयू, भिवानी की कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुईं। समापन सत्र में डॉ. बीआर आंबेडकर विधि विवि, सोनीपत के कुलपति प्रो. देवेंद्र सिंह भी उपस्थित रहे।

वक्ताओं ने कहा कि परीक्षा को केवल विद्यार्थी की स्मरण शक्ति परखने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसमें वैचारिक समझ, आलोचनात्मक चिंतन, तार्किक क्षमता, रचनात्मकता, ज्ञान के अनुप्रयोग, विश्लेषण और समस्या-समाधान कौशल का भी आकलन होना चाहिए। प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता, कठिनाई स्तर, वस्तुनिष्ठ एवं वर्णनात्मक प्रश्नों में संतुलन, मूल्यांकन में एकरूपता और मॉडरेशन जैसे पहलुओं को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

संवाद में परीक्षा की सुरक्षा और विश्वसनीयता को भी प्रमुख मुद्दा बनाया गया। प्रश्नपत्र लीक, नकल, अनुचित साधनों के प्रयोग, प्रतिरूपण, परीक्षा सामग्री की सुरक्षित निगरानी, एजेंसियों की जवाबदेही और ऑडिट तंत्र पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि परीक्षा सुधार केवल तकनीक अपनाने से संभव नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रियाओं और मजबूत निगरानी तंत्र की भी जरूरत है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), कंप्यूटर आधारित परीक्षा, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, डिजिटल मूल्यांकन और डेटा आधारित आकलन को भविष्य की परीक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण उपकरण बताया गया। साथ ही साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता, नैतिकता और मानवीय निगरानी सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

समावेशी परीक्षा व्यवस्था पर चर्चा के दौरान क्षेत्रीय भाषाओं, बहुभाषी मूल्यांकन, दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए सुविधाओं तथा ग्रामीण और आर्थिक रूप से वंचित विद्यार्थियों की जरूरतों को ध्यान में रखने की बात कही गई। वक्ताओं ने कहा कि भाषा, भौगोलिक स्थिति या शारीरिक अक्षमता किसी विद्यार्थी की वास्तविक योग्यता के आकलन में बाधा नहीं बननी चाहिए।

भारतीय शिक्षा परंपरा को आधुनिक मूल्यांकन से जोड़ते हुए तक्षशिला और नालंदा जैसी परंपराओं में संवाद, प्रश्न, बहस, व्यावहारिक ज्ञान और विद्यार्थी-केंद्रित अधिगम का उल्लेख किया गया। कहा गया कि परीक्षा अंक प्राप्त करने की प्रक्रिया के बजाय सीखने, कौशल विकास, चरित्र निर्माण और सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने का माध्यम बने।

कार्यक्रम में पांच विषयगत समूह बनाए गए—परीक्षा डिजाइन एवं मूल्यांकन, परीक्षा सुरक्षा एवं विश्वसनीयता, प्रौद्योगिकी आधारित भविष्य की परीक्षाएं, समावेश एवं भाषा तथा विद्यार्थी अनुभव एवं परीक्षा कल्याण। समूहों ने समस्याओं और संभावित समाधानों पर चर्चा कर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं।

एमडीयू के डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. रणदीप राणा, कुलसचिव प्रो. संदीप बंसल, एफडीसी निदेशक प्रो. मुनीष गर्ग, भारतीय शिक्षा मंडल के प्रदेश प्रमुख डॉ. जितेंद्र भारद्वाज, बीपीएसएमवी के कुलसचिव डॉ. शिवालिक यादव, डॉ. चंचल भारद्वाज सहित शिक्षा एवं परीक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।