समाचार विश्लेषण/काले दिन और अच्छे दिन?

समाचार विश्लेषण/काले दिन और अच्छे दिन?
कमलेश भारतीय।

-कमलेश भारतीय 
आपातकाल को फिर काले दिनों के रूप में याद दिला रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अन्य भाजपा नेता । मोदी कह रहे हैं कि आपातकाल के काले दिनों को भुलाया नहीं जा सकता जब संस्थानों को सुनियोजित तरीके से ध्वस्त कर दिया गया था ।लोकतांत्रिक भावना को मजबूत करने के लिए देशवासियों ने भरसंभव प्यास किये । देश में 25 जून , 1975 से 21 मार्च, 1977 तक लगभग 21 महीने की अवधि तक आपातकाल लागू किया गया था । 

बात सही है और बाद में गठित किये गये शाह आयोग की सुनवाई के दौरान ऐसी ऐसी गाथाएं निकल कर आई थीं कि रौंगटे खड़े हो जाते थे । सुनवाई पर बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे होते । अभी भाजपा सरकार ने आपातकाल के दौरान सज़ा काटने वालों को सम्मानित भी किया । जैसे कांग्रेस स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करती आई थी । ये लोग दूसरी आजादी के सैनिक माने गये और हैं भी लेकिन इन आपातकाल के दिनों को काले दिन कहने वालों ने नारा दिया और सपना दिखाया अच्छे दिनों का ।

क्या काले दिन खत्म हो गये और अच्छे दिन आ गये ? वैसे लोग यह दुहाई सोशल मीडिया पर दे रहे हैं कि हमें हमारे पुराने दिन ही लौटा दो । हमें नहीं चाहिएं आपके अच्छे दिन । अच्छे दिनों को खुद भाजपा नेता भी एक जुमला मात्र कह कर पीछा छुड़ाने लगे हैं । अब अच्छे दिनों में रसोई गैस , पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं । प्याज हर साल रुलाता है और टमाटर लाल आंखें दिखाता है । कोरोना पर किसी का बस नहीं । इसे भगाने के लिए थाली बजाओ तो कभी मोमबत्ती जलाओ उत्सव मनाये गये और फिर टीका उत्सव के बीच पश्चिमी बंगाल के चुनाव में खुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने बड़ी बड़ी रैलियां कीं । रक्तरंजित पश्चिमी बंगाल के दौरान खूब खेला होई । 

इन आपातकाल के दिनों को काले दिन कहने वालों ने आधी रात को बिना बहुमत के महाराष्ट्र में सरकार बनवा दी । ऐसा कीर्तिमान कहीं देखा सुना ? हैं न अच्छे दिन । पहले कभी लाल कृष्ण आडवाणी रोहतक जेल देखने आते और अपने काले दिन याद करते लेकिन अब वे बाहर ही नहीं निकलते और इन अच्छे दिनों के बारे में कुछ नहीं कहते । उन्होंने मीडिया के बारे में कहा था कि हमने तो थोड़ा झुकने को कहा था ये तो दंडवत् ही हो गये और आज के मीडिया के बारे में क्या कहेंगे ? जिस पर बिना आपातकाल के ही पता नहीं कितना दवाब है । कितने पत्रकारों को चैनलों से बाहर कर दिया गया।  क्यों ? क्या अच्छे दिनों की खातिर ? अब आडवाणी जी रथयात्रा लेकर नहीं चलेंगे देश के कोने कोने का हाल जानने ? सीबीआई हो या फिर निर्वाचन आयोग इन्हें किसने अपने पिंजरे के तोते बनाया ? क्या आपातकाल कहना और काले दिनों को याद करना ही काफी है या अपने कदमों पर पुनर्विचार करना भी जरूरी है ? किसान आंदोलन को दबाने के लिए कितनी कीलें ठोकी गयीं और कितने रास्ते खोद दिये गये ? कितनी कितनी बार किसानों पर लाठीचार्ज हुए ? क्या ये अच्छे दिन हैं? सोच विचार की जरूरत है । अब काले दिन कह कर बस आलोचना करते रहना सही नहीं।  अपने कदमों पर भी मंथन कीजिए और अच्छे दिनों की ओर लौट आइए ।