सीलिएक बीमारी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

अभिभावकों को बीमारी की जल्द पहचान, जांच और इलाज के प्रति किया जागरूक।

सीलिएक बीमारी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

रोहतक, गिरीश सैनी। पीजीआईएमएस, रोहतक के चिकित्सा अधीक्षक एवं शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. कुंदन मित्तल के नेतृत्व में बाल रोग विभाग द्वारा शनिवार को ओपीडी में सीलिएक बीमारी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।  सीलिएक अवेयरनेस मंथ के रूप में मई माह में इस कार्यक्रम का उद्देश्य अभिभावकों, शिक्षकों और आमजन को इस बीमारी की जल्द पहचान, जांच और इलाज के प्रति जागरूक करना था।

डॉ. कुंदन मित्तल ने कहा कि सीलिएक बीमारी अब बच्चों में तेजी से बढ़ रही है। ये एक ऑटोइम्यून बीमारी है जो गेहूं व जौ में पाए जाने वाले ग्लूटेन प्रोटीन से होती है। उन्होंने बताया कि अगर पेट फूलना, लगातार दस्त, वजन न बढ़ना, लंबाई रुक जाना और खून की कमी जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत बाल रोग ओपीडी में जांच कराएं। पीजीआईएमएस में इसके लिए रक्त जांच और बायोप्सी की सुविधा उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि समय पर जांच और जीवन भर ग्लूटेन-फ्री डाइट ही इसका एकमात्र इलाज है।

बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. अंजलि वर्मा ने अभिभावकों को फूड लेबल पढ़ने की बारीकियां समझाते हुए कहा कि सीलिएक बीमारी में सिर्फ रोटी-परांठा ही नहीं, बल्कि बाजार की अन्य सैकड़ों चीजें खतरनाक हो सकती हैं। पैकेट वाले चिप्स, नमकीन, चॉकलेट, सॉस, सूप पाउडर, आइसक्रीम और दवा की कुछ गोलियों में भी ग्लूटेन छिपा होता है। ये माल्ट, स्टेबलाइजर, थिकनर या फ्लेवरिंग एजेंट के रूप में होता है। उन्होंने कहा कि अभिभावक कोई भी सामान खरीदने से पहले इंग्रीडिएंट लिस्ट जरूर पढ़ें। गेहूं का आटा, जौ, माल्ट, माल्ट सिरप लिखा हो तो उसे न खरीदें। ग्लूटेन-फ्री का लोगो देखकर ही सामान लें। उन्होंने कहा कि घर में अलग चकला-बेलन और तवा रखना चाहिए, ताकि ग्लूटेन का संक्रमण न हो। 

डॉ. अंजलि वर्मा ने विभाग द्वारा किए गए एक अहम शोध के नतीजे भी साझा किए, जो सीलिएक और टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों पर किया गया था। सर्वे में शामिल 50% से ज्यादा अभिभावकों ने माना कि स्कूल में जन्मदिन आदि पर केक, टॉफी आदि बांटने जैसी गतिविधियों से उनके बच्चे का शुगर लेवल बिगड़ता है या पेट खराब होता है। कई बच्चों ने कहा कि वे अलग महसूस करते हैं क्योंकि वे सबके साथ नहीं खा सकते। डॉ. अंजलि ने शिक्षकों से अपील की कि स्कूल में नो फूड शेयरिंग पॉलिसी बनाएं और जन्मदिन पर टॉफी की जगह पेंसिल, रबड़ या किताब बांटने को बढ़ावा दें, ताकि सभी बच्चे शामिल हो सकें।

डॉ. एन.डी. वासवानी ने कहा कि शुरुआती जांच से इलाज आसान हो जाता है। डाइटीशियन मीनू ने चावल, मक्का, बेसन, कुट्टू और साबूदाना से बने ग्लूटेन-फ्री व्यंजनों की जानकारी दी। बाल मनोवैज्ञानिक डॉली ने कहा कि बच्चे को बार-बार ये मत खाओ कहने की बजाय उसे बीमारी से अवगत कराएं, ताकि वह खुद जिम्मेदार बने। इस दौरान 200 से अधिक अभिभावक मौजूद रहे।