ये देश है बाबाओं का, क्या कहना?
-कमलेश भारतीय
कहां तो यह कहा जाता था कि यह देश है वीर जवानों का, इस देश का यारो क्या कहना पर कहां अब कहा जा रहा है कि यह देश है बाबाओं का, इस देश का यारो क्या कहना ! इसका सबसे ताज़ा मामला महाराष्ट्र के भोंदू बाबा उर्फ कैप्टन उर्फ अशोक खरात के रूप में सामने आया है, जिस पर एक पीड़ित महिला ने यौन शोषण का आरोप लगाया और जब जांच शुरू हुई तो ऐसे ऐसे वीडियो पुलिस के हाथ लगे कि महाराष्ट्र महिला आयोग की अध्यक्षा रूपाली चाकणकर तक जा पहुंचे और उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। वे एनसीपी (पंवार गुट) की महिला मोर्चा की भी प्रदेशाध्यक्ष थीं। दोनों पदों से हाथ धोना पड़ा । लोगों का कहना है कि भोंदू बाबा के वीडियोज ने तो चर्चित एपस्टीन फाइल्स और धुरंधर फिल्म को भी पीछे छोड़ दिया। और भी कमाल यह कि भोंदू बाबा अपनी इन ऊंची सोसाइटी की अमीर महिलाओं से इस तरह धार्मिक कर्मकांड करवाने के नाम पर पचास लाख रुपये तक ऊंची फीस अग्रिम वसूलता था, तब कहीं जाकर नम्बर पड़ता था । शिकायत करने वाली महिला के अनुसार कोई नशीला पदार्थ पिला कर और वीडियो बनाकर वह उसे दो वर्ष तक उत्पीड़ित करता रहा। इस तरह पुलिस के अनुमान व जांच के अनुसार एक सौ करोड़ रुपये की सम्पत्ति बना चुका था भोंदू बाबा ! महाराष्ट्र महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष एक वीडियो में भोंदू बाबा के चरण पखारती भी नज़र आती हैं। एम बी ए तक शिक्षित, ऊंचे पद पर शोभायमान रूपाली चाकणकर को कैसे महिला आयोग की अध्यक्ष बना दिया गया, जो अपनी ही रक्षा नहीं कर सकी, वह अन्य पीड़ित महिलाओं की रक्षा कैसे करती? वैसे वीडियोज में वह कहीं भी पीड़ित दिखाई नहीं दे रही ! भोंदू बाबा मात्र दसवीं फेल बताया जा रहा है और उसकी फोटोज अनेक बड़े नेताओं के साथ भी हैं, जिससे वह अपना प्रभाव जमाने में उपयोग करता था । पुलिस को भोंदू बाबा ने कहा कि यह सब एक धार्मिक प्रकिया थी! वाह रे बाबा और यह तुम्हारी धार्मिक प्रक्रिया ! क्या कहने ! यदि वह पीड़ित महिला शिकायत लेकर पुलिस तक न पहुंचती तो न जाने कब तक यह मनभावन प्रक्रिया चलती रहती।
भोंदू बाबा से पहले हरियाणा के एक बाबा के भी दो साध्वियों के प्रधानमंत्री के नाम लिखे खत ने जो सामने लाने की कोशिश की, उस खत को छापकर पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को अपनी जान से इसकीकीमत चुकानी पड़ी। बेशक सज़ा हुई लेकिन कम से कम सत्रह बार जेल की सलाखों के बाहर भी छुट्टी मनाने का अवसर मिला। अब तो पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट से भी कुछ मामलों में राहत मिलती जा रही है और रामचंद्र छत्रपति का परिवार सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह रहा है। बाबा के लव चार्जर जैसे गाने और महंगी लौकियों की चर्चा भी खूब रही। शायद इनके भी कोई अपनी तरह के अनुष्ठान होंगे ! बाबा का अप्रत्यक्ष रूप से राज्य की राजनीति पर भी प्रभाव माना जाता है और उनके एक इशारे या संदेश पर चुनाव परिणाम प्रभावित होने की बातों को हवा मिलती रहती है ।
क्या आप लोग आसाराम बापू को भूल गये, जो अपनी कुटिया में एक किशोरी के यौन शोषण के अपराध में सलाखों के पीछे हैं और इनकी सम्पत्ति भी अकूत हो गयी थी !
क्या शिक्षा के प्रसार के बावजूद इस तरह पाखंडियों के पीछे एक बड़ा वर्ग लगा रहेगा और कब तक? ये सिर्फ तीन चार बाबा ही नहीं हैं, अनेक बाबाओं के समय समय पर, अलग अलग जगह पर मामले उजागर होते रहते हैं और मीडिया इनसे भरा रहता है लेकिन कोई सीख नहीं लेता, संदेश नहीं जाता ! भक्तो़ं की कमी नहीं और शिक्षित, राजनेता और बड़े बड़े अधिकारी भी इनके मायाजाल में फंसे मिलते हैं। दिल्ली के एक बाबा के संचालित शिक्षा संस्थान की छात्राओं ने भी बाबा पर गंभीर आरोप लगाये थे। यह मामला भी खूब उछला लेकिन सबक क्या या आगे क्या हुआ, कोई नहीं जानता!
फिलहाल तो भोंदू बाबा के चलते महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आया हुआ है। पता नहीं किसका नाम उछल कर सामने आ जाये!
तो फिर बताइये, यह देश है वीर जवानों का या फिर.....?
(विचार व्यक्तिगत हैं।)

Kamlesh Bhartiya 

