हरियाणा की माटी से /सोशल मीडिया पर नकेल

हरियाणा की माटी से /सोशल मीडिया पर नकेल
कमलेश भारतीय।

-*कमलेश भारतीय 
क्या देश के मीडिया को बंधक जैसा बना लेने के बाद सोशल मीडिया को भी बंधक जैसा बनाने की कोशिश की गयी ? यदि सबसे ज्यादा प्रचलित ट्वीटर के पूर्व सीईओ जैक डोर्सी की मानें तो यही बात सामने आ रही है । डोर्सी न केवल इसके सीईओ थे बल्कि सहसंचालक भी थे । उनका कहना है कि किसान आंदोलन के समय कई खातों व पोस्ट पर रोक लगाने को कहा गया था ! ऐसा न करने पर कंपनी का कामकाज बंद करने की धमकियों के साथ दबाब भी बनाया गया था । 
जाहिर है कि डोर्सी के इस दावे के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गयी । कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा ! दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने इसे झूठ का पुलिंदा बताने में कोई देर नहीं लगाई । कांग्रेस ने कहा कि मौजूदा केंद्र सरकार देश में लोकतंत्र को कमज़ोर करने पर तुली हुई है । जहां किसान अपनी मागों के लिये कड़कती धूप , बारिश और सर्दी में साल भर बैठे रहे वहीं एक तानाशाह उनकी आवाज दबाने में लगा रहा ! यह विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से पूर्व उठा है यानी विदेश में भी यह सवाल उनका पीछा करेगा ! 
इतना तो सन् 2014 के बाद से सब देख रहे हैं कि मीडिया का स्वरूप और कामकाज का तरीका बदलता चला गया है । टीवी चैनलों में सच का सामना करवाने वाले एंकर्ज धीरे धीरे बाहर कर दिये गये । इनमें अजीत अंजुम , अभिसार कौशिक ,  पुण्य प्रसून वाजपेयी के बाद सबसे आखिरी शिकार हुए रवीश कुमार ! यह भी कहा गया कि जब पत्रकार को नहीं खरीद सके तब पूरा चैनल ही खरीद लिया ! अब ये सभी पत्रकार अपने अपने यूट्यूब चैनल चलाते हैं और इनके यूट्यूब चैनल्स ने ही किसान आंदोलन की आवाज देश विदेश तक पहुंचाई जबकी गोदी मीडिया का किसान आंदोलन के नेताओं ने सरेआम बहिष्कार किया ! यदि ये यूट्यूब चैनल नहीं होते तो किसान नेता राकेश टिकैत के आधी रात गिरफ्तारी के समय उनके आंसू कौन दिखाता और फिर कैसे इस आंदोलन को संजीवनी मिलती ! यह सब यूट्यूबर्ज ने संभव कर दिखाया ! गोदी चैनल तो कुछ का कुछ दिखाकर किसान आंदोलन को कमज़ोर करने में जुटे हुए थे । हर नकारात्मक खबर को उछाल रहे थे लेकिन इन यूट्यूबर्ज ने इनकी चाल नहीं चलने दी । इस तरह किसान आंदोलन को सफलता दिलाई जबकि गोदी मीडिया की हार हुई । जिस मीडिया का काम लोगों को सही जानकारी देना था वही मीडिया गुमराह करने लगा । मुंशी प्रेमचंद की कही बात याद आती है कि लेखक का काम जगाना है , सुलाना नहीं । यही काम मीडिया का है लेकिन मीडिया ने तो न केवल अपनी चाल बल्कि चरित्र ही बदल लिया । स्वतंत्रता पूर्व जो मीडिया देश की आजादी की लड़ाई में शामिल था वही मीडिया अब लोकतंत्र की रक्षा से पीछे हट रहा है । मीडिया को खरीदने को भारत जोड़ो यात्रा में लगातार राहुल गांधी ने भी निशाने पर रखा जब जनसभाओं में त॔ज कसते कहा कि चौबीस घंटे में दो चार मिनट हमें भी दिखा दिया करो ! पर हम आपकी विवशताओं को समझते हैं ! इस तरह मीडिया को आइना दिखाने की कोशिश की लेकिन शर्म मगर उन्हें नहीं आती ! वैसे सच बोलने पर राहुल गांधी को संसद से बाहर कर दिया गया ! 
खींचो न कमानों को , न तलवार निकालो 
जब तोप मुकाबिल हो तब अखबार निकालो ! 

यह बात अब झूठी पड़ती जा रही है । जब गंगा किनारे कोरोना काल में लावारिस शव दिखाने की कोशिश एक अखबार ने की तब उसके दफ्तरों पर भी छापे पड़े और दबाब बनाने की कोशिश की गयी ! तो क्या ट्वीटर के पूर्व सीईओ झूठ बोल रहे हैं ? इसी से अंदाजा लगा लीजिये ! 
तभी तो कहा जा रहा है कि जो अखबार छ्प के बिकते थे 
अब बिक कर छपते हैं ! 
-*पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।