भीषण गर्मी और सांस की परेशानी के संकेत नजरअंदाज न करें, फेफड़ों पर हो सकता है असर
रोहतक, गिरीश सैनी। भीषण गर्मी में लगातार बढ़ता तापमान एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। आमतौर पर हीटवेव को केवल डिहाइड्रेशन, थकान या हीट एग्जॉशन से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन अत्यधिक गर्मी फेफड़ों और श्वसन तंत्र पर भी गहरा असर डाल सकती है। लंबे समय तक तेज गर्मी के संपर्क में रहने से सांस लेने में कठिनाई, चक्कर आना, अत्यधिक थकावट और हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। बच्चों, बुजुर्गों, खुले वातावरण में काम करने वाले लोगों तथा अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीजों में इसका खतरा और अधिक होता है।
तापमान बढ़ने पर शरीर अपने तापमान को नियंत्रित रखने के लिए अधिक मेहनत करता है। पसीना निकलना और रक्त संचार बढ़ना शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन इससे ऑक्सीजन की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप सांसें तेज चलने लगती हैं और कई लोगों को सांस लेने में परेशानी महसूस हो सकती है। यदि वातावरण में नमी अधिक हो, तो स्थिति और जटिल हो जाती है, क्योंकि पसीना आसानी से नहीं सूख पाता और शरीर प्रभावी ढंग से ठंडा नहीं हो पाता।
रेस्पिरेटरी पल्मोनरी विशेषज्ञ डॉ. सनी कालरा ने बताया कि गर्मियों के दौरान विशेष रूप से शहरों में ओजोन और स्मॉग का स्तर भी बढ़ जाता है। ये प्रदूषक फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं और खांसी, घरघराहट, सीने में जकड़न तथा सांस फूलने जैसी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। अस्थमा के मरीजों में गर्म और उमस भरे मौसम के दौरान लक्षण अक्सर ज्यादा गंभीर हो जाते हैं क्योंकि उनके वायुमार्ग पर्यावरणीय बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम में कुछ चेतावनी संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को अत्यधिक सांस फूलना, लगातार घरघराहट, सीने में जकड़न, सांस की तकलीफ के कारण बोलने में कठिनाई, होंठों या उंगलियों का नीला पड़ना, लगातार खांसी, चक्कर आना, भ्रम की स्थिति या अत्यधिक कमजोरी महसूस हो, तो तुरंत चिकित्सीय सलाह लेनी चाहिए।
गर्मियों में फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए कुछ सरल सावधानियां साझी करते हुए उन्होंने बताया कि दिन के सबसे गर्म समय में घर के अंदर रहने का प्रयास करें, एयर क्वालिटी की जानकारी पर नजर रखें और प्रदूषण बढ़ने पर बाहरी गतिविधियों को सीमित करें। घर और कार्यस्थल को ठंडा तथा हवादार बनाए रखें, पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं और तेज धूप में भारी शारीरिक गतिविधियों से बचें। हल्के और ढीले कपड़े पहनें तथा अस्थमा या सीओपीडी के मरीज अपनी दवाएं नियमित रूप से लेते रहें। संभव हो तो, एयर कंडीशनर या ह्यूमिडिफायर का उपयोग कर घर के अंदर की नमी को नियंत्रित रखें।
Girish Saini 


