भावना, संवेदना, इमोशन नहीं दे सकता एआईः पद्मश्री प्रो वामन माधवराव

वर्ल्ड थिएटर डे पर सुपवा में नाट्य संवाद व परिचर्चा आयोजित।

भावना, संवेदना, इमोशन नहीं दे सकता एआईः पद्मश्री प्रो वामन माधवराव

रोहतक, गिरीश सैनी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी), दिल्ली के पूर्व निदेशक पद्मश्री प्रो वामन माधवराव केंद्रे ने कहा कि थिएटर की जगह एआई कभी नहीं ले सकता। जो भावना, संवेदना, इमोशन, आकर्षण, ऊर्जा, चुंबकीय अनुभव थिएटर के दौरान कलाकारों की अदाकारी से मिलता है, वह एआई व डिजिटल मीडिया कभी नहीं दे सकता। थिएटर को टीवी, सिनेमा, लाइटिंग, तकनीक और अत्याधुनिक सेट आज तक भी मात नहीं दे पाए। जुनूनी लोगों के प्रयासों से थिएटर पहले भी था, आज भी है और आगे भी जिंदा रहेगा।

वे दादा लख्मी चंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विवि (डीएलसी सुपवा), रोहतक में वर्ल्ड थियेटर डे पर आयोजित नाट्य संवाद व परिचर्चा में बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रहे थे। फिल्म एवं टेलीविजन फैकल्टी के अभिनय विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का विषय -वर्तमान संदर्भ में रंगमंचः डिजिटल मीडिया और तकनीक का प्रभाव रहा। इस दौरान प्रसिद्ध नाटककार व लेखक डॉ प्रताप सहगल तथा प्रसिद्ध रंगकर्मी व नाट्य प्रशिक्षक डॉ मृत्युंजय प्रभाकर ने भी अपने विचार साझा करते हुए विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया।

कुलपति डॉ अमित आर्य ने स्वागत संबोधन करते हुए कहा कि रंगमंच को जिंदा रखने की जिम्मेदारी सुपवा परिवार भली-भांति समझता है, इसलिए फरवरी माह में विश्व के सबसे बड़े इंटरनेशनल थिएटर फेस्टिवल भारत रंग महोत्सव के हरियाणा चैप्टर की मेजबानी की। इसके साथ ही थिएटर को बढ़ावा देने के लिए चार दिवसीय महोत्सव सारंग का भी आयोजन किया गया, जिसमें प्रदेश के अलग-अलग जिलों में थिएटर को बढ़ावा देने वाले 40 से अधिक नाटककार, रंगकर्मी, निर्देशक, थिएटर क्लब संचालकों को सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि थिएटर का स्थान बरकरार रखने के उद्देश्य से ही वर्ल्ड थिएटर डे मनाते हुए देश के प्रसिद्ध नाटककार, निर्देशक, लेखक व रंगकर्मियों को छात्रों से रूबरू कराने के लिए आमंत्रित किया गया है।

 

पद्मश्री प्रो केंद्रे ने कहा कि अपनी कहानी, आइडिया, कथन को दूसरों तक पहुंचाने के लिए छात्र सिनेमा पढ़ना चाहते हैं। निर्देशन, लेखन, कथाकार, कलाकार, साउंड डिजाइन, आर्ट डिजाइन, कॉस्ट्यूम डिजाइन आदि ऐसी विधाएं हैं, जो अन्य रूटीन पढ़ाई से हट कर हैं। इनमें वही बच्चे दाखिला लेते हैं, जिनमें कुछ अलग करने का जज्बा होता है।

नाटककार व लेखक डॉ प्रताप सहगल ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को सही मायने में इंसान बनाने का काम नाटक करता है। यह नाटक ही है, जो व्यक्ति की सोच का दायरा व्यापक करने के साथ ही समृद्ध करता है। उसे संवेदनशील बनाता है। नाटक का मौलिक आकर्षण शब्दों से मन में चित्र खड़ा करना है, जो एआई व डिजिटल मीडिया कभी नहीं कर सकते। एआई की शरण में पूरी तरह जाएंगे तो यह थिएटर को भटका सकता है। इसलिए इसका थिएटर को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए प्रयोग तो करें, लेकिन पूरी तरह से शरण में न जाएं।

रंगकर्मी व नाट्य प्रशिक्षक डॉ मृत्युंजय प्रभाकर ने कहा कि एआई व डिजिटल मीडिया समेत अन्य तकनीक का प्रयोग थिएटर में करना गलत नहीं है, लेकिन पूरी तरह इनके भरोसे होना बिल्कुल गलत है। ये कभी भी नाटक की मूल विचारधारा की जगह नहीं ले सकते। एआई की अपनी सीमित क्षमता है, जबकि थिएटर का दायरा व्यापक है।

एक्टिंग विभाग के प्रो विभांशु वैभव ने मंच संचालन किया। सहायक प्रोफेसर अजय कुमार सिंह ने अतिथि परिचय दिया। इस दौरान फिल्म एवं टेलीविजन विभाग के एफसी महेश टीपी, प्लानिंग एवं आर्किटेक्चर के एफसी अजय बाहू जोशी, विजुअल आर्ट्स के एफसी विनय कुमार, अभिनय विभाग से सहायक प्रोफेसर दुष्यंत, केशव कुमार, डायरेक्शन से दीप्ति खुराना, ऑडियोग्राफी से देबाशीश रे, एडिटिंग से इंद्रनील घोष आदि भी मौजूद रहे।

नाट्य संवाद व परिचर्चा में पहुंचे अतिथियों का स्वागत फिल्म एवं टेलीविजन के छात्रों ने सामूहिक शंखनाद से किया। दिव्यांशु व धीरज ने वर्ल्ड थिएटर डे का संदेश पढ़ा तथा भारती व गौरव ने कविता पाठ किया। एफटीवी के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत रंग-संगीत ने जमकर वाहवाही लूटी। अतिथियों ने एफटीवी डिपार्टमेंट में लगाई प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया, जिसमें विवि में हुए आयोजनों के साथ ही विद्यार्थियों द्वारा बनाई शॉर्ट फिल्म व डॉक्यूमेंट्री के बारे में बताया गया।