गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी-विभाग में विशेष व्याख्यान का आयोजन
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा के प्रो. विजय कुमार कर्ण बतौर मुख्य वक्ता उपस्थित रहे। सर्वप्रथम विभागाध्यक्ष एवं अधिष्ठाता, भाषा-संकाय प्रो. सुनील ने पौधा व अंगवस्त्र भेंट करके मुख्य अतिथि का स्वागत किया।
अमृतसर, 29 नवंबर, 2025: गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा के प्रो. विजय कुमार कर्ण बतौर मुख्य वक्ता उपस्थित रहे। सर्वप्रथम विभागाध्यक्ष एवं अधिष्ठाता, भाषा-संकाय प्रो. सुनील ने पौधा व अंगवस्त्र भेंट करके मुख्य अतिथि का स्वागत किया।

प्रो. सुनील ने मुख्य अतिथि का परिचय देते हुए बताया कि प्रो. विजय कुमार कर्ण विगत 25 वर्षों से संपूर्ण देश में संस्कृत भाषा, हिंदी भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए अभूतपूर्व कार्य कर रहे हैं। वे 'परिशीलनम्', 'सेवा चेतना' तथा 'शैक्षिक संकल्प ' तीन पत्रिकाओं का संपादन कर रहे हैं। वे 'अवध की मिसाल', गुलदस्ता ए लखनऊ' और 'गोमती तुम बहती रहना' तीन धारावाहिकों के पटकथा लेखक और प्रोड्यूसर रहे हैं। वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग के भाषाविद विशेषज्ञ हैं। इन्होंने दूरदर्शन उत्तर प्रदेश के लिए तीन फिल्मों 'श्रमेव जयते', 'तपोमूर्ति स्वामी ब्रह्मानंद' तथा 'दिव्य कुंभ' में अनुसंधान परिकल्पना और पटकथा लेखक के रूप में कार्य किया है। वे त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय और झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय में महामहिम राष्ट्रपति के नामित सदस्य हैं। इनकी शताधिक शोध-आलेख और पुस्तकें प्रकाशित हैं। इन्हें दर्जनों प्रतिष्ठित मान-सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
प्रो. विजय कुमार कर्ण ने अपने वक्तव्य में कहा कि जीवन में मूल्यों और संस्कारों का निर्माण साहित्य के माध्यम से होता है। साहित्य समाज को दिशा देता है, नैतिक मूल्यों का संचार करता है, और सामाजिक विसंगतियों को उजागर कर सुधार का मार्ग प्रशस्त करता है। मूल्य जीवन को उद्देश्य और दिशा देते हैं, जबकि संस्कार चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व को सार्थक बनाते हैं। साहित्य इन सभी के बीच एक पुल का काम करता है, जिससे समाज और व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है। उन्होंने कहा कि साहित्यिक शोध की उपयोगिता ज्ञान का विस्तार करना, सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि प्रदान करना, और समस्याओं का समाधान खोजना है। यह मौजूदा साहित्य की समीक्षा करके ज्ञान की वर्तमान स्थिति को समझने, शोध में अंतराल की पहचान करने और भविष्य के शोध के लिए एक आधार प्रदान करने में मदद करता है। इसके अतिरिक्त, यह ऐतिहासिक ज्ञान को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर सांस्कृतिक विरासत और बौद्धिक विकास को समृद्ध करता है।
प्रो. सुनील ने मुख्य वक्ता का धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर हिंदी विभाग के अध्यापकों डॉ. सपना शर्मा, डॉ. लवलीन कौर, मैडम पिंकी शर्मा, डॉ. नेहा हंस सहित विभागीय शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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