साहिर लुधियानवी अपनी मिट्टी और मातृसंस्था से अटूट मोह- लुधियाना से आत्मीय रिश्ता और अपने महाविद्यालय के प्रति अद्वितीय अनुराग
साहिर लुधियानवी अपनी मिट्टी और मातृसंस्था से अटूट मोह- लुधियाना से आत्मीय रिश्ता और अपने महाविद्यालय के प्रति अद्वितीय अनुराग
25 अक्तूबर 1980 को मुंबई में इस दुनिया से विदा हुए साहिर लुधियानवी की 46वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक महान शायर और फिल्मी गीतकार को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस इंसान को स्मरण करना भी है, जिसकी शख्सियत में काव्य-संवेदना, सामाजिक चेतना और अपनी जन्मभूमि के प्रति अथाह प्रेम एक साथ समाहित थे। उनकी कलम ने प्रेम, विरह, मानवीय पीड़ा, सामाजिक विषमता और युद्ध की विभीषिका को ऐसी आवाज दी कि दशकों बाद भी उनके शब्द लोगों के दिलों में जीवित हैं।
लुधियाना की मिट्टी में जन्मे इस शायर ने उर्दू साहित्य और भारतीय सिनेमा में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनके फिल्मी गीत आज भी गाए जाते हैं, उनकी शायरी अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी है और उनकी रचनाएं नई पीढ़ी को भी आकर्षित करती हैं। लेकिन साहिर के जीवन का एक ऐसा पहलू भी है, जिसे अधिक चर्चा में लाने की आवश्यकता है—अपने शहर और अपने कॉलेज के साथ उनका अटूट रिश्ता।
साहित्यिक ऊंचाइयां और सामाजिक सरोकार
8 मार्च 1921 को लुधियाना में जन्मे साहिर ने अपनी कलम के माध्यम से समाज की विसंगतियों को उजागर किया। उनकी शायरी केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं थी; उसमें समाज से सवाल करने और मानवीय जीवन को बेहतर बनाने की बेचैनी भी थी।
उनका काव्य-संग्रह तल्खियां 1945 में प्रकाशित हुआ। युद्ध-विरोधी लंबी कविता परछाइयां उनकी वैचारिक गहराई का महत्वपूर्ण प्रमाण है। वर्ष 1979 में प्रकाशित आओ कि कोई ख्वाब बुनें उनकी काव्य-यात्रा का एक अन्य महत्वपूर्ण पड़ाव था।
प्रगतिशील लेखक आंदोलन से उनका जुड़ाव साहित्य को सामाजिक वास्तविकताओं से जोड़ने की उनकी सोच को दर्शाता है। उन्होंने अदब-ए-लतीफ, शाहकार, प्रीतलड़ी और सवेरा जैसी पत्रिकाओं के संपादन के माध्यम से भी साहित्यिक क्षेत्र में योगदान दिया।
उनकी उपलब्धियों को पद्मश्री, फिल्मफेयर पुरस्कारों और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे सम्मानों से मान्यता मिली। लेकिन साहिर की वास्तविक पूंजी उनकी रचनाओं के साथ लोगों के दिलों में बनी वह जगह थी, जिसे कोई सम्मान या पुरस्कार माप नहीं सकता।
1956 की यादगार यात्रा: जब प्रेम पैसे से बड़ा साबित हुआ
एस.सी.डी. सरकारी कॉलेज, लुधियाना के इतिहास में साहिर की 22 दिसंबर 1956 की यात्रा का विशेष स्थान है। विभाजन के बाद यह अपने कॉलेज से दोबारा जुड़ने का उनका यादगार अवसर था। कॉलेज की छात्र संघ ने उन्हें कवि सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया था। इस कार्यक्रम के मुख्य आयोजक छात्र संघ के सचिव श्रीराम आरश थे।
इस प्रसंग का विस्तृत विवरण अनूप सिंह संधू ने अपनी पुस्तक “लाइफ़ एंड लव्स ऑफ़ साहिर लुधियानवी” में भी दिया है, जिसका प्रकाशन चेतना प्रकाशन ने किया है।
उस समय छात्र संघ ने साहिर के आने-जाने के खर्च के अतिरिक्त 500 रुपये मानदेय देने का वादा किया था। इस राशि की व्यवस्था टिकट बेचकर की जानी थी। लेकिन कार्यक्रम के समय विद्यार्थी बड़ी संख्या में सभागार में पहुंच गए। सभागार पूरी तरह भर गया और बाहर खड़े श्रोताओं के लिए लाउडस्पीकर की व्यवस्था भी की गई। शहर की कई प्रमुख हस्तियां भी इस कार्यक्रम में मौजूद थीं।
साहिर ने अपनी लंबी कविता परछाइयां का पाठ किया। सभागार में गहरा सन्नाटा छा गया। कविता समाप्त होने के बाद कई मिनट तक तालियों की गूंज सुनाई देती रही। श्रोताओं की मांग पर उन्होंने उस समय निर्माणाधीन फिल्म प्यासा का एक गीत भी सुनाया:
जाने वो कैसे लोग थे जिनके, प्यार को प्यार मिला।
हमने तो कलियां मांगी, कांटों का हार मिला।
इस गीत ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम में सत्यपाल आनंद भी मौजूद थे। वह इसी कॉलेज के पूर्व विद्यार्थी और उस समय कॉलेज पत्रिका के संपादक थे। बाद में उन्होंने एक प्रतिष्ठित लेखक के रूप में ख्याति अर्जित की। उन्होंने साहिर के करीबी मित्र, कवि और चित्रकार कृष्ण अदीब को बताया कि टिकटों की बिक्री से केवल 75 रुपये एकत्र हुए थे। इतनी छोटी राशि एक प्रसिद्ध शायर को देने में उन्हें संकोच हो रहा था।
जब कृष्ण अदीब ने यह बात साहिर को बताई, तो उनका जवाब उनकी शख्सियत के सबसे खूबसूरत पहलू को सामने लाता है।
साहिर ने कहा कि वह लुधियाना पैसे कमाने नहीं आए थे। यह उनका अपना कॉलेज था और अपना शहर। वह अपने ही लोगों से पैसे कैसे ले सकते थे? उन्होंने विद्यार्थियों को धन्यवाद देने के लिए कहा और स्पष्ट किया कि उन्हें पैसे की नहीं, उनके प्यार की भूख थी। विद्यार्थी जब चाहें, उन्हें बिना किसी झिझक के आमंत्रित कर सकते हैं।
अनूप सिंह संधू की पुस्तक में भी वर्णित यह प्रसंग साहिर के जीवन का ऐसा पन्ना है, जिसे बार-बार याद किया जाना चाहिए। प्रसिद्धि और सफलता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद उनके लिए अपने कॉलेज के विद्यार्थियों का स्नेह किसी भी मानदेय से अधिक मूल्यवान था।
1970 की स्वर्ण जयंती: मातृसंस्था को शब्दों का ताज
कॉलेज की स्थापना 1920 में हुई थी और 1970 में इसकी स्वर्ण जयंती मनाई गई। ये समारोह 19 नवंबर से 29 नवंबर तक चले। आज यह संस्थान एस.सी.डी. सरकारी कॉलेज के नाम से जाना जाता है। इसका नाम एक अन्य महान पूर्व विद्यार्थी, सतीश चंद्र धवन, के सम्मान में रखा गया है।स्वर्ण जयंती के अवसर पर कॉलेज ने अंतरराष्ट्रीय मुशायरे का आयोजन किया, जिसमें साहिर लुधियानवी के साथ शिव कुमार बटालवी, जान निसार अख्तर और कंवर महिंदर सिंह बेदी जैसी साहित्यिक हस्तियों ने भाग लिया।
उस समय के राष्ट्रपति वी.वी. गिरि को भी समारोह में आमंत्रित किया गया था, लेकिन अस्वस्थता के कारण वह नहीं आ सके। उनके स्थान पर तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. वी.के.आर.वी. राव ने समारोह में भाग लिया और 23 नवंबर 1970 को साहिर को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया। इस अवसर पर साहिर ने अपने कॉलेज के लिए एक अत्यंत भावपूर्ण कविता सुनाई। इसमें उन्होंने अपने पूर्वजों के शहर, अपनी शिक्षा के केंद्र और बचपन की गलियों को याद किया:
मेरे अजदाद का वतन, ये शहर
मेरी तालीम का जहां, ये मुकाम
यहीं उतरा था शायर का इल्हाम
मेरे बचपन की दोस्त ये गलियां
इनमें रुसवा हुआ शबाब का नाम
मैं जहां भी रहा, यहीं का रहा
मेरे साथ गया, इस मकाम का नाम।
इन पंक्तियों में एक ऐसे इंसान का आत्मीय लगाव प्रकट होता है, जिसने दुनिया के बड़े मंचों पर पहचान हासिल करने के बावजूद अपने बचपन, अपने शहर और अपने कॉलेज को नहीं भुलाया। तत्कालीन प्राचार्य ने इस कविता को कॉलेज के लिए सम्मान का ताज बताया। उनका कहना था कि संस्थान के अनेक विद्यार्थियों ने बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं और ऊंचे पदों पर पहुंचे, लेकिन एक ऐसे पूर्व विद्यार्थी की ओर से अपनी मातृसंस्था के लिए इस तरह का श्रद्धापूर्ण काव्य-उपहार मिलना ऐतिहासिक घटना थी। कॉलेज ने साहिर को एक विशेष प्रशस्ति-पत्र भी प्रदान किया। इस अवसर पर प्राचार्य ने साहिर की हस्तलिखित कविता को कॉलेज के अभिलेखों में सुरक्षित रखने के लिए अपने पास ले लिया। ये केवल कागज पर लिखी पंक्तियां नहीं थीं, बल्कि एक महान शायर की ओर से अपनी मातृसंस्था को दिया गया प्रेम का अमूल्य उपहार थीं।
साहिर लेखक सभा: विद्यार्थियों में जागी साहित्यिक चेतना
1970 की स्वर्ण जयंती का प्रभाव केवल समारोहों तक सीमित नहीं रहा। उसी वर्ष कॉलेज के विद्यार्थियों ने साहिर लेखक सभा का गठन किया। यह साहिर की साहित्यिक शख्सियत और उनकी रचनाओं से मिली प्रेरणा की अभिव्यक्ति थी।
कॉलेज के साहित्यिक वातावरण के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। इनमें प्रोफेसर बलजीत सिंह सज्जाद का विशेष उल्लेख आवश्यक है, जो भूगोल के अध्यापक होने के साथ-साथ कवि भी थे। ऐसी शख्सियतों की उपस्थिति ने विद्यार्थियों में शैक्षणिक रुचि के साथ साहित्यिक संवेदना को भी प्रोत्साहित किया।
साहिर लेखक सभा की स्थापना इस बात का प्रतीक थी कि किसी महान साहित्यकार की वास्तविक विरासत उसकी पुस्तकों तक सीमित नहीं रहती। वह नए लेखकों को प्रेरित करती है, युवाओं को सोचने के लिए प्रोत्साहित करती है और संस्थानों की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाती है।
एक पूर्व विद्यार्थी की निजी स्मृति
“मैं, सरकारी कॉलेज, लुधियाना का उस दौर का विद्यार्थी होने के नाते 1970 की स्वर्ण जयंती के समारोहों में शामिल हुआ था। साहिर की कॉलेज यात्रा मेरी स्मृतियों में एक विशेष स्थान रखती है। उस समय हमारे लिए उनकी शख्सियत केवल फिल्मी गीतों या प्रसिद्ध शायरी तक सीमित नहीं थी। वह हमारे अपने शहर के सपूत और हमारी संस्था का गौरव थे।“
साहिर की 1956 और 1970 की यात्राएं दो अलग-अलग घटनाएं होने के बावजूद एक ही संदेश देती हैं। पहली यात्रा में उन्होंने पैसे के बजाय विद्यार्थियों का प्यार चुना; दूसरी में अपनी मातृसंस्था को ऐसी कविता भेंट की, जिसे कॉलेज के इतिहास में गर्व के साथ याद किया जाता है। उसी वर्ष साहिर लेखक सभा की स्थापना ने इस रिश्ते को एक और अर्थपूर्ण आयाम दिया।
आज उनकी 46वीं पुण्यतिथि पर यह आवश्यक है कि हम उन्हें केवल एक महान शायर के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे इंसान के रूप में भी याद करें, जिसने अपनी जड़ों से कभी नाता नहीं तोड़ा। उनका जीवन सिखाता है कि बड़ी उपलब्धियां हासिल करने के बाद भी अपनी मिट्टी, अपने लोगों और अपनी शिक्षण संस्था के प्रति सम्मान बनाए रखना ही वास्तविक महानता है।
साहिर की स्मृति को शहर के जीवन में स्थायी स्थान मिले
साहिर के प्रति अपने सम्मान और आत्मीय संबंध को स्थायी रूप देने के लिए कॉलेज के पूर्व विद्यार्थियों ने कुछ महत्वपूर्ण मांगें भी उठाई हैं।उनकी मांग है कि कॉलेज रोड का नाम पुनः ‘साहिर मार्ग’ रखा जाए, जैसा कि साहिर के निधन के बाद पहले किया गया था। इसके साथ ही रोज गार्डन स्थित पुस्तकालय का नाम साहिर लुधियानवी के नाम पर रखने और वहां इस महान शायर की गरिमा के अनुरूप एक सुंदर प्रतिमा स्थापित करने की मांग भी की गई है।
साहिर की साहित्यिक विरासत और कॉलेज के साथ उनके गहरे संबंध को स्वीकार करते हुए संस्थान पहले ही अपने सभागार का नाम ‘साहिर ऑडिटोरियम’ और एक उद्यान का नाम ‘साहिर बॉटनिकल रिसर्च गार्डन’ रख चुका है। पूर्व विद्यार्थियों का मानना है कि अब शहर को भी इस दिशा में सार्थक कदम उठाने चाहिए, ताकि लुधियाना के इस महान सपूत की स्मृति को स्थायी सम्मान मिल सके और आने वाली पीढ़ियां उनके साहित्यिक योगदान तथा अपनी जन्मभूमि के प्रति उनके प्रेम से प्रेरणा ले सकें।
साहिर लुधियानवी आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द, उनकी सोच और अपनी मातृसंस्था से जुड़ी यादें हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। लुधियाना के लिए वह केवल एक महान शायर नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी से प्रेम करने वाले ऐसे सपूत हैं, जिन्होंने दुनिया भर में नाम कमाया, लेकिन अपने शहर और कॉलेज को कभी नहीं भुलाया।
यही साहिर की वास्तविक विरासत है—शब्दों की अमरता, मानवीय संवेदना और अपनी जड़ों से अटूट जुड़ाव।

बृज भूषण गोयल
संगठन सचिव
पूर्व विद्यार्थी संघ
एस.सी.डी. सरकारी कॉलेज, लुधियाना

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